*ब्लैकआउट मॉकड्रिल गोरखपुर में रही बेअसर*
*मुख्य चौराहों पर जलती रहीं लाइटें, दौड़ती रहीं गाड़ियां, निर्देशों की उड़ती दिखी धज्जियां*
न्यूज सबकी पसंद गोरखपुर से ब्यूरो चीफ प्रदीप कुमार मौर्या की रिपोर्ट
गोरखपुर। प्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित समय शाम 6:00 बजे ब्लैकआउट मॉकड्रिल के तहत स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि सायरन बजते ही सभी प्रकार की लाइटें बंद कर दी जाएं और आम जनमानस पूरी तरह से ब्लैकआउट का पालन करे। बावजूद इसके गोरखपुर जनपद में यह मॉकड्रिल कागज़ों तक ही सीमित नजर आई और जमीनी स्तर पर इसका कोई खास असर दिखाई नहीं दिया।
जहां एक ओर दिग्विजयनाथ पार्क में औपचारिक रूप से मॉकड्रिल का आयोजन किया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर शहर की मुख्य सड़कों और चौराहों पर हालात पूरी तरह सामान्य बने रहे। गोलघर, शास्त्री चौक, जिला अस्पताल रोड समेत अन्य प्रमुख स्थानों पर स्ट्रीट लाइटें जलती रहीं, वाहन धड़ल्ले से चलते रहे और आम दिनों की तरह चहल-पहल बनी रही।
शासन द्वारा निर्धारित समय 6:00 बजे के बावजूद ब्लैकआउट का असर कई इलाकों में देर से या नाममात्र का दिखाई दिया। अंबेडकर चौक की ओर लाइटें लगभग साढ़े छह बजे बंद की गईं, जबकि शास्त्री चौक, जिला अस्पताल मार्ग और गोलघर रोड पर 6:30 बजे तक भी लाइटें जलती रहीं, जो निर्देशों के खुले उल्लंघन को दर्शाता है।
ब्लैकआउट के दौरान न तो दुकानों की लाइटें बंद कराई गईं और न ही सड़कों पर किसी प्रकार की सख्ती दिखाई दी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो अधिकांश लोगों को मॉकड्रिल की गंभीरता की जानकारी ही नहीं थी या फिर निर्देशों को हल्के में लिया गया।
नगर निगम द्वारा दिनभर चौराहों पर लगे लाउडस्पीकरों के माध्यम से आम जनमानस को सचेत करने का दावा जरूर किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि इसका कोई प्रभाव नजर नहीं आया। न पुलिस की सक्रिय तैनाती दिखी और न ही प्रशासनिक अमला ब्लैकआउट को प्रभावी ढंग से लागू कराता दिखाई दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक तैयारियों और आपातकालीन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मॉकड्रिल का उद्देश्य आपदा या आपात स्थिति में प्रशासन और नागरिकों की तत्परता को परखना होता है, लेकिन गोरखपुर में यह अभ्यास महज औपचारिकता बनकर रह गया।
शहरवासियों का कहना है कि जब मॉकड्रिल के दौरान ही शासन के निर्देशों का पालन सुनिश्चित नहीं कराया जा सका, तो वास्तविक आपात स्थिति में व्यवस्था कैसे संभाली जाएगी, यह एक बड़ा सवाल है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस लापरवाही से कोई सबक लेता है या भविष्य में ऐसे अभ्यास भी केवल रस्म अदायगी तक सीमित रहेंगे।
